इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोशल मीडिया नियमों में संभावित बदलाव को लेकर चर्चा शुरू की है। मौजूदा व्यवस्था में सेफ हार्बर के तहत प्लेटफॉर्म्स को यूजर-जनरेटेड कंटेंट के लिए कानूनी संरक्षण मिलता है। सरकार अब इस सुरक्षा को सोशल मीडिया कंपनियों से हटाकर इंटरनेट सेवा, टेलीकॉम और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स तक सीमित करने के विकल्प पर विचार कर रही है।
क्या है सेफ हार्बर और किसे मिलता है इसका लाभ?
सेफ हार्बर एक तरह का कानूनी संरक्षण है। इसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स की ओर से पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीधे जिम्मेदार नहीं माना जाता, बशर्ते वे कानून के तहत निर्धारित शर्तों का पालन करें। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और X जैसे प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों यूजर्स रोजाना पोस्ट, वीडियो, फोटो और कमेंट साझा करते हैं। मौजूदा व्यवस्था में इन सभी पोस्ट की सामग्री के लिए प्लेटफॉर्म्स को स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता।
यह सुरक्षा सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं से जुड़ी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण रही है। इसके तहत यूजर्स के कंटेंट को लेकर कंपनियों को कुछ कानूनी संरक्षण मिलता है। हालांकि, इस संरक्षण का मतलब यह नहीं है कि कंपनियां सरकारी या अदालत के निर्देशों की अनदेखी कर सकती हैं। नियमों के तहत उन्हें संबंधित निर्देशों का पालन करना होता है और गैरकानूनी कंटेंट को हटाने या उस पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
एल्गोरिदम से कंटेंट की पहुंच तय करने पर सवाल
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के एक वर्ग का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियां अब केवल यूजर्स की पोस्ट को एक-दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम नहीं रह गई हैं। ये प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिदम के जरिए तय करते हैं कि किस यूजर को कौन-सा वीडियो, पोस्ट या सामग्री दिखाई जाएगी। यूजर की पसंद, गतिविधियों और कंटेंट के साथ उसके जुड़ाव के आधार पर पोस्ट की रैंकिंग और सिफारिश की जाती है।
उदाहरण के तौर पर, कोई व्यक्ति यूट्यूब, इंस्टाग्राम या फेसबुक पर किस तरह के वीडियो देखता है, किन पोस्ट को लाइक करता है और किस सामग्री पर अधिक समय बिताता है, इन गतिविधियों के आधार पर उसे आगे उसी तरह का कंटेंट दिखाया जा सकता है। प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम इस प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। सरकार के स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब कंपनियां कंटेंट की पहुंच और प्रसार को प्रभावित करती हैं, तो उन्हें उससे जुड़ी कानूनी जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग कैसे रखा जा सकता है।
इसके अलावा, सोशल मीडिया कंपनियां अपनी कम्युनिटी गाइडलाइन के आधार पर पोस्ट हटाने, अकाउंट सीमित करने या कंटेंट की पहुंच घटाने का फैसला भी करती हैं। इन कंपनियों के आंतरिक नियम कई बार भारतीय कानूनों से अलग हो सकते हैं। ऐसे में प्लेटफॉर्म्स की भूमिका और उनकी जवाबदेही को लेकर नए सिरे से विचार किया जा रहा है।
इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट का मामला
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही को लेकर बच्चों के यौन शोषण से संबंधित कंटेंट का मामला भी चर्चा में रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने दिल्ली पुलिस को उन आरोपों की व्यापक जांच करने का निर्देश दिया था, जिनमें कहा गया था कि Meta के स्वामित्व वाले इंस्टाग्राम पर पेड विज्ञापनों के जरिए भारत में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) को बढ़ावा दिया गया।
NHRC ने पुलिस को यह भी जांचने के निर्देश दिए थे कि क्या संबंधित टेक कंपनी और अन्य पक्षों ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग से जुड़ी जिम्मेदारियों का पालन किया था। इस मामले ने सोशल मीडिया पर अवैध और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने में प्लेटफॉर्म्स की भूमिका पर सवाल खड़े किए।
BBC की जांच में इंस्टाग्राम विज्ञापनों को लेकर सामने आए दावे
BBC की जांच से जुड़ी रिपोर्ट में इंस्टाग्राम पर विज्ञापनों और बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री के प्रसार को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, जांच के लिए BBC ने भारत में एक नया इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया। शुरुआत में इस अकाउंट ने ऐसे कुछ प्रोफाइल फॉलो किए, जो सामान्य कंटेंट पोस्ट करते थे।
इसके बाद अकाउंट पर यौन प्रकृति वाले विज्ञापन दिखाई देने लगे। कुछ विज्ञापनों में बच्चों के शोषण से जुड़ी सामग्री के लिए टेलीग्राम चैनलों के लिंक भी दिए गए थे। रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ दिनों बाद ऐसे विज्ञापनों की संख्या बढ़ती दिखाई दी। BBC की जांच के दौरान कुल 30 अलग-अलग विज्ञापन मिले, जिनमें से 20 विज्ञापन वयस्क यौन सामग्री से जुड़े थे। इस जांच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापनों की निगरानी और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने की व्यवस्था पर सवाल उठाए।
नियमों में बदलाव से कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ सकती है
यदि केंद्र सरकार सेफ हार्बर से जुड़े नियमों में बदलाव करती है, तो सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर्स की ओर से साझा किए जाने वाले कंटेंट की निगरानी और उस पर कार्रवाई को लेकर अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है। इससे प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी सामग्री की पहचान, शिकायतों पर कार्रवाई और निर्धारित निर्देशों के पालन के लिए अपनी व्यवस्था मजबूत करनी पड़ सकती है।
हालांकि, अभी यह प्रस्ताव विचार और चर्चा के स्तर पर है। नियमों में बदलाव का अंतिम स्वरूप क्या होगा और किन प्लेटफॉर्म्स पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा, यह स्पष्ट नहीं है। फिलहाल सरकार की ओर से सोशल मीडिया कंपनियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की समीक्षा की जा रही है। इस संभावित बदलाव का असर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, कंटेंट मॉडरेशन और यूजर्स की ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ी जवाबदेही पर पड़ सकता है।
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