Kartik Maas 2026: हिंदू पंचांग का आठवां महीना कार्तिक मास इस वर्ष 24 नवंबर 2026 तक रहेगा। इस दौरान दीपावली, धनतेरस, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा और देवउठनी एकादशी जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाएंगे। कार्तिक मास को पूजा-पाठ, स्नान, दीपदान और दान-पुण्य के लिए विशेष महत्व वाला माना जाता है। इस महीने में श्रद्धालु भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश, भगवान धन्वंतरि, सूर्य देव, छठी माता, गोवर्धन पर्वत और भगवान कार्तिकेय की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में श्रद्धापूर्वक किए गए जप, तप, पूजा और दान से पुण्य की प्राप्ति होती है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, कार्तिक मास में सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने की परंपरा है। इस दौरान पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। जो श्रद्धालु नदी तक नहीं जा सकते, वे घर पर स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं। इसके अलावा सुबह और शाम दीपदान करने तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की भी परंपरा है।
कार्तिक मास के नाम को लेकर एक पौराणिक कथा भगवान कार्तिकेय से जुड़ी है। कथा के अनुसार, प्राचीन समय में तारकासुर नाम के असुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था। वरदान मांगते समय उसने कहा कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों हो सके। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया। उस समय देवी सती के देह त्यागने के बाद भगवान शिव तपस्या में लीन थे। तारकासुर को लगा कि शिव जी दोबारा विवाह नहीं करेंगे और उनके पुत्र का जन्म भी नहीं होगा। इसी विश्वास के आधार पर उसने वरदान मांगा था।
वरदान मिलने के बाद तारकासुर ने देवताओं, ऋषि-मुनियों और मनुष्यों को परेशान करना शुरू कर दिया। उसके अत्याचारों से दुखी देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। इसके बाद देवताओं ने भगवान शिव का विवाह कराने का निर्णय लिया और कामदेव से सहायता मांगी। पौराणिक कथा के अनुसार, कामदेव के प्रयास से भगवान शिव की तपस्या भंग हुई, लेकिन शिव जी के क्रोध से कामदेव भस्म हो गए।
इसी दौरान देवी पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। इसके बाद भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ। कथा के अनुसार, उनका पालन-पोषण कैलाश पर्वत से दूर कुछ कृतिकाओं ने किया था। इसी वजह से उन्हें कार्तिकेय नाम मिला।
जब कार्तिकेय बड़े हुए, तो शिव-पार्वती ने उन्हें कैलाश बुलाया। देवताओं ने उनसे तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान शिव ने कार्तिकेय को देवताओं की सेना का सेनापति नियुक्त कर युद्ध के लिए भेजा। युद्ध में कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया और देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह घटना कार्तिक मास में हुई थी। भगवान शिव कार्तिकेय के पराक्रम से प्रसन्न हुए और इस महीने का नाम कार्तिक रखा, ताकि उनके शौर्य को याद रखा जा सके। इसी मान्यता के चलते कार्तिक मास में भगवान कार्तिकेय की पूजा का भी विशेष महत्व बताया जाता है।
कार्तिक मास में श्रद्धालु कई धार्मिक कार्य नियमित रूप से करते हैं। इनमें सूर्योदय से पहले स्नान करना प्रमुख है। नदी में स्नान संभव नहीं होने पर घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान के बाद तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करने और सूर्य मंत्र का जप करने की परंपरा है। इसके बाद घर के मंदिर में अपने इष्टदेव की पूजा की जाती है। श्रद्धालु भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान शिव और भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जप भी कर सकते हैं।
इस महीने में दीपदान का विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु शाम को घर के मंदिर में घी या तेल का दीपक जलाते हैं। परंपरा के अनुसार, नदी या तालाब के किनारे भी दीपदान किया जाता है। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को धन, अनाज, कपड़े और सर्दियों में उपयोगी ऊनी वस्त्र दान करने की सलाह दी जाती है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन कराना और असहाय लोगों की मदद करना भी इस महीने के प्रमुख पुण्य कार्यों में शामिल है।
कार्तिक मास में गौसेवा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु गौशालाओं में गायों के लिए चारा, भोजन या उनकी देखभाल के लिए आर्थिक सहायता दे सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में नियमित पूजा-पाठ, स्नान, दीपदान और सेवा के कार्यों से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
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