1904 में हुई थी वाचनालय की स्थापना
पंडित सुंदरलाल शर्मा ने वर्ष 1904 में इस वाचनालय की स्थापना की थी। यह स्थान केवल पुस्तकों का संग्रहालय नहीं रहा, बल्कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है।
बताया जाता है कि पंडित सुंदरलाल शर्मा ने राजिम में साहित्यिक समितियों के माध्यम से सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया। कम उम्र में साहित्य सृजन करने वाले शर्मा ने छत्तीसगढ़ की सामाजिक चेतना और जनजागरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी स्मृतियों से जुड़ा यह भवन आज ऐतिहासिक महत्व रखता है, लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर इसके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है।
दीवारों में दरारें, परिसर में उगी झाड़ियां
वाचनालय भवन की स्थिति लंबे समय से रखरखाव की जरूरत को दर्शा रही है। दीवारों में दरारें दिखाई दे रही हैं और कई स्थानों पर प्लास्टर उखड़ चुका है। परिसर में घास और झाड़ियां उग आई हैं।
मुख्य गेट और दरवाजों पर लंबे समय से ताले लगे होने के कारण यह भवन अब वीरान नजर आता है। कभी साहित्य प्रेमियों और पाठकों की गतिविधियों से जुड़े इस स्थान के बंद होने से स्थानीय लोगों में भी निराशा है।
अब स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि भवन की तकनीकी जांच कर समय रहते आवश्यक संरक्षण और जीर्णोद्धार कराया जाए, ताकि ऐतिहासिक संरचना को और नुकसान से बचाया जा सके।
6 हजार दुर्लभ पुस्तकों पर मंडरा रहा संकट
वाचनालय के भीतर करीब 6 हजार पुरानी और दुर्लभ पुस्तकें रखी बताई जा रही हैं। इनमें से कई पुस्तकें काफी पुरानी हो चुकी हैं और उनके पन्नों की स्थिति कमजोर होने की बात सामने आई है।
परिवार से जुड़ी पद्मा दुबे के अनुसार, संस्कृति विभाग के निर्देश पर पुस्तकों की सूची विभाग को भेजी गई थी। हालांकि, पुस्तकों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया अब तक आगे नहीं बढ़ पाई है।
यही वजह है कि अब दुर्लभ साहित्य के डिजिटल संरक्षण की मांग तेज हो रही है। विशेषज्ञ स्तर पर संरक्षण, सूचीकरण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया शुरू होने पर इन पुस्तकों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुरानी पुस्तकों की भौतिक प्रतियों को सुरक्षित रखने के साथ उनका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना भी जरूरी है।
आधुनिक वाचनालय बनाने की मांग
राजिम नगर पालिका अध्यक्ष महेश यादव ने भी इस ऐतिहासिक वाचनालय के संरक्षण की आवश्यकता बताई है। मांग की गई है कि पंडित सुंदरलाल शर्मा के व्यक्तित्व और उनके योगदान के अनुरूप भवन का जीर्णोद्धार कराया जाए।
इसके साथ ही पुराने पुस्तक संग्रह का डिजिटलीकरण कर यहां आधुनिक सुविधाओं से युक्त वाचनालय विकसित करने की मांग सामने आई है। यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो पुरानी धरोहर के संरक्षण के साथ नई पीढ़ी को भी छत्तीसगढ़ के साहित्य, इतिहास और सामाजिक आंदोलनों से जुड़ी सामग्री तक पहुंच मिल सकती है।
पंडित शर्मा के परिवार से जुड़े विकास शर्मा का भी कहना है कि नई पीढ़ी को उनके साहित्य और विचारों से परिचित कराने के लिए भवन और पुस्तकों का संरक्षण आवश्यक है।
पहले भी हो चुका है जीर्णोद्धार
वर्ष 1940 में पंडित सुंदरलाल शर्मा के निधन के बाद वाचनालय बंद हो गया था। बाद के वर्षों में इसके संरक्षण और पुनर्संचालन के प्रयास किए गए।
जानकारी के अनुसार, भुवनलाल मिश्रा के प्रयासों से 1991-92 में इसका जीर्णोद्धार कराया गया था। इसके बाद परिवार की ओर से वाचनालय के संचालन की जिम्मेदारी संभाली गई और वर्ष 2000 से 2013-14 तक इसका संचालन किया गया।
वर्ष 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी इस ऐतिहासिक वाचनालय का दौरा किया था। पंडित सुंदरलाल शर्मा के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला और उनके नाम से डाक टिकट जारी किया गया था।




