Raigarh News: रायगढ़ में शुक्रवार को चेट्रीचंड्र महोत्सव के अवसर पर सिंधी समाज की आस्था और संस्कृति का ऐसा सैलाब उमड़ा, जिसने पूरे शहर को भक्ति की अनोखी ऊर्जा से भर दिया। झूलेलाल प्रभु के जयघोष, सजीव झांकियों और हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी ने शहर को मानो एक विशाल आध्यात्मिक मंच में बदल दिया। हर गली–कूचे में “आयो लाल… झूलेलाल” की गूंज थी और रायगढ़ ने सिंधी समाज की एकता, इतिहास और संस्कृति को दिल से महसूस किया।
शोभायात्रा ने रायगढ़ को बदल दिया—हर मोड़ पर आस्था, हर चौराहे पर उमंग
सिंधी कॉलोनी, पक्की खोली स्थित झूलेलाल मंदिर से सुबह भव्य शोभायात्रा की शुरुआत हुई।
फूलों से सजा पालना, रंगीन झंडे, जल के कलश और पारंपरिक परिधानों में पुरुष–महिलाएं—हर दृश्य भावनाओं से भर देने वाला था।
यात्रा चक्रधर नगर चौक–सिग्नल चौक–कच्ची खोली से गुजरती हुई न्यू मरीन ड्राइव पहुंची, जहां साईं झूलेलाल और बहराणा साहिब की मनोहारी आरती की गई। इसके बाद बहराणा साहिब का विधिवत विसर्जन सम्पन्न हुआ।
स्थानीय लोगों के अनुसार,
“रायगढ़ में इतना भावुक और भव्य चेट्रीचंड्र पहले कभी नहीं देखा गया।”
झूलेलाल और सिंधी इतिहास—आस्था की 1075 साल पुरानी कथा
चेट्रीचंड्र केवल नया साल नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक स्मृति–दिवस है।
करीब 1075–1076 वर्ष पहले, सिंध प्रांत के ठट्टा नगर में मिरखशाह नामक शासक ने हिंदू समुदाय पर अत्याचार शुरू किए। धर्मांतरण के दबाव से टूटे सिंधी समाज ने सिंधु नदी के किनारे 40 दिनों का कठोर व्रत किया।
भक्ति से प्रसन्न होकर वरुण देव ने मछली रूप में प्रकट होकर दिव्य बालक झूलेलाल के रूप में जन्म लिया।
उन्होंने समाज को अत्याचार से मुक्त कराया और एकता, शांति व सद्भाव का संदेश दिया।
झूलेलाल आज भी सिंधी समुदाय के इष्टदेव, संरक्षक और जल–देवता माने जाते हैं।
यही कारण है कि शोभायात्रा में कलश, जल अर्पण और नदी–पूजन प्रमुख रूप से शामिल रहते हैं।
1947 के बाद बिखरी जड़ें, लेकिन संस्कृति आज भी मजबूती से खड़ी
विभाजन के बाद विशाल विस्थापन झेलने के बावजूद सिंधी समाज ने अपनी संस्कृति को न केवल सहेजकर रखा, बल्कि उसे देशभर में फैलाया।
रायगढ़ के बुजुर्गों ने भावुक होकर कहा—
“हम सिंध से आए, पर झूलेलाल ने हमें कभी अकेला नहीं छोड़ा।”
आज की यात्रा उसी अमर पहचान और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का प्रतीक है।
भक्ति, संगीत और भावनाओं का अनोखा संगम
शोभायात्रा में:
- महिलाओं की आयो लाल… झूलेलाल की मंगलध्वनि
- युवा पीढ़ी का ढोल–नगाड़ों पर नृत्य
- छोटे बच्चों का पारंपरिक पोशाक में जयकारे
- बुजुर्गों की नम आंखें और folded hands
- श्रद्धालुओं द्वारा जल कलश से अर्घ्य
इन सभी ने पूरे कार्यक्रम को एक दिव्य उत्सव में बदल दिया।
गैर–सिंधी समुदाय के लोग भी सड़क किनारे खड़े होकर झांकियां देखते रहे और तालियों से स्वागत करते रहे। यह दृश्य रायगढ़ की समन्वय परंपरा और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करता है।
झांकियों में सजी जीवंत कथा—साईं झूलेलाल से लेकर संत कंवर राम तक
साईं झूलेलाल की झांकी सबसे आकर्षक रही।
संत कंवर राम की शिक्षाओं—प्रेम, सद्भाव और सेवा—को भी विशेष रूप से दर्शाया गया।
कई झांकियों ने सिंध से भारत आने की पीड़ा, संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत को भावुक कर देने वाली शैली में प्रस्तुत किया।
लोगों ने कहा कि झांकियों ने “इतिहास को सड़कों पर चलने जैसा अनुभव कराया।”
रायगढ़ में चेट्रीचंड्र—सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला संदेश
महोत्सव ने यह संदेश दिया कि
संस्कृति, आस्था और पहचान को कोई विस्थापन मिटा नहीं सकता।
सिंधी समुदाय की युवा पीढ़ी ने बड़े गर्व से बताया:
“हमने सिंध नहीं देखा, पर हमारी संस्कृति ही हमारा सिंध है।”
इस वर्ष की शोभायात्रा ने न केवल आस्था जगाई, बल्कि यह भी याद दिलाया कि झूलेलाल की कृपा में सब एक हैं—भले ही जमीन बदल जाए, पर जड़ें कभी नहीं बदलतीं।
Impact: रायगढ़ ने दिया सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का संदेश
इस चेट्रीचंड्र ने रायगढ़ को एक गहरी अनुभूति दी—
कि तमाम विविधताओं के बावजूद यहां की संस्कृति एकजुट होकर त्योहार मनाना जानती है।
रायगढ़ में आज का दृश्य केवल एक शोभायात्रा नहीं, बल्कि
आस्था की जीत, इतिहास की स्मृति और सद्भाव का अनोखा उत्सव था।
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