ढाका | स्वास्थ्य-विज्ञान
NIPAH Virus: बांग्लादेश में वैज्ञानिकों ने हालिया शोध के दौरान एक ऐसे चमगादड़-जनित वायरस की पहचान की है, जो अब तक स्वास्थ्य निगरानी के दायरे से बाहर रहा था और इंसानों को संक्रमित कर रहा है। इस खोज ने निपाह वायरस जैसी घातक जूनोटिक बीमारियों को लेकर पुरानी आशंकाओं को फिर से तेज कर दिया है, लेकिन इसमें एक अहम अंतर भी सामने आया है। यह वायरस निपाह नहीं है, बल्कि एक अलग रोगजनक है, जो बहुत हद तक उसी जैसे लक्षण पैदा करता है।
यह खुलासा उन मरीजों के पुराने क्लिनिकल सैंपल की दोबारा जांच के दौरान हुआ, जिनमें बुखार, सिरदर्द, उल्टी, सांस संबंधी परेशानी और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे निपाह-समान लक्षण पाए गए थे, लेकिन निपाह वायरस की नियमित जांच में वे बार-बार नेगेटिव आ रहे थे।
निपाह नहीं, बल्कि Pteropine orthoreovirus की पहचान
एडवांस्ड जीनोमिक सीक्वेंसिंग तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए वैज्ञानिकों ने इन सैंपल्स में Pteropine orthoreovirus (PRV) की मौजूदगी की पुष्टि की। यह एक चमगादड़-जनित वायरस है, जिसे पहले ज्यादातर जानवरों में या फिर इंसानों में बेहद दुर्लभ मामलों में देखा गया था। शोधकर्ताओं ने मरीजों के सैंपल से वायरस को लैब में कल्चर करके यह भी साबित किया कि संक्रमण सक्रिय था, न कि किसी पुराने या निष्क्रिय वायरस का अवशेष।
इस खोज ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बीते वर्षों में निपाह समझे गए कुछ मामलों के पीछे कहीं यह वायरस या फिर दोनों का सह-संक्रमण तो नहीं रहा।
कैसे फैला इंसानों में संक्रमण
सभी पहचाने गए मामलों में एक समान कड़ी सामने आई—मरीजों ने हाल ही में कच्चा खजूर का रस (रॉ डेट-पाम सैप) पिया था। बांग्लादेश में यह एक पारंपरिक मौसमी पेय है और निपाह वायरस के फैलाव का भी जाना-पहचाना रास्ता माना जाता है। फलाहारी चमगादड़ खजूर के पेड़ों से रस पीते समय उसमें अपनी लार, मूत्र या मल के जरिए वायरस छोड़ सकते हैं, जिससे इंसानों तक संक्रमण पहुंचता है।
यही कारण है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि PRV का इंसानों में प्रवेश भी इसी रास्ते से हुआ।
क्यों है यह खोज बेहद अहम
यह खोज केवल एक नए वायरस की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए इसके दूरगामी मायने हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि PRV निपाह जैसे लक्षण पैदा करता है, लेकिन निपाह की नियमित जांच में पकड़ा नहीं जाता। इसका मतलब यह हुआ कि केवल निपाह पर केंद्रित टेस्टिंग से कई मामलों में असली वजह छूट सकती है।
दूसरी अहम बात यह है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में अब तक PRV को अपेक्षाकृत हल्की बीमारी से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन बांग्लादेश में सामने आए मामलों में लक्षण ज्यादा गंभीर पाए गए। कुछ मरीजों में लंबे समय तक स्वास्थ्य समस्याएं बनी रहीं और पहले के दस्तावेजीकृत मामलों में कम से कम एक मौत की भी जानकारी है। इससे संकेत मिलता है कि यह वायरस इस क्षेत्र में अलग तरह से व्यवहार कर सकता है या समय के साथ ज्यादा खतरनाक रूप ले रहा है।
तीसरी बात यह है कि यह खोज बताती है कि निपाह के अलावा भी कई ऐसे चमगादड़-जनित वायरस हो सकते हैं, जो पहले से इंसानों को संक्रमित कर रहे हैं, खासकर उन इलाकों में जहां इंसान और चमगादड़ का संपर्क ज्यादा है।
निपाह की पृष्ठभूमि में नई चुनौती
हालांकि यह वायरस निपाह नहीं है, लेकिन इसकी पहचान ऐसे समय पर हुई है जब निपाह को लेकर दक्षिण एशिया में सतर्कता पहले से बनी हुई है। भारत के पश्चिम बंगाल में हाल के महीनों में निपाह के मामलों की पुष्टि हुई है, जहां स्वास्थ्य विभाग ने कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और निगरानी तेज कर दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) निपाह को उच्च मृत्यु-दर वाला जूनोटिक संक्रमण मानता है, जिसके लिए अभी कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में PRV की पहचान यह स्पष्ट करती है कि खतरा सिर्फ एक वायरस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इकोसिस्टम से जुड़ा हुआ है।
विशेषज्ञों की सिफारिशें
इस खोज के बाद वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कई अहम सुझाव दिए हैं। सबसे पहले, निपाह जैसे लक्षण वाले मरीजों की जांच में व्यापक वायरस सर्विलांस की जरूरत बताई गई है, ताकि PRV जैसे अन्य रोगजनकों की पहचान समय पर हो सके।
इसके साथ ही, डायग्नोस्टिक प्रोटोकॉल में बदलाव की सिफारिश की गई है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां कच्चा खजूर रस पीने की परंपरा है या चमगादड़ों के साथ इंसानी संपर्क ज्यादा रहता है।
सार्वजनिक जागरूकता को भी बेहद जरूरी बताया गया है। विशेषज्ञों की सलाह है कि लोग कच्चा खजूर का रस पीने से बचें या उसे उबालकर ही इस्तेमाल करें। साथ ही, चमगादड़-प्रभावित इलाकों में जाने या ऐसे खाद्य पदार्थ लेने के बाद यदि तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी या सांस की तकलीफ जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
बड़ी तस्वीर में क्या संकेत
बांग्लादेश में PRV की पहचान यह याद दिलाती है कि जूनोटिक बीमारियों का खतरा लगातार बदल रहा है। यह खोज न सिर्फ निपाह निगरानी को मजबूत करने की जरूरत बताती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि छिपे हुए वायरस पहले से हमारे बीच मौजूद हो सकते हैं, जिन्हें पहचानने के लिए विज्ञान और स्वास्थ्य तंत्र को एक कदम आगे रहना होगा।
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