National News: भारतीय रुपये में बुधवार, 3 जून 2026 की शुरुआती ट्रेडिंग में गिरावट दर्ज की गई। डॉलर के मुकाबले रुपया 28 पैसे कमजोर होकर 95.64 के स्तर पर पहुंच गया। विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट वैश्विक व्यापार तनाव, अमेरिका की नई टैरिफ नीति और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार निवेशकों की धारणा कमजोर होने से रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है।
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 95.43 पर खुला और कुछ ही समय में यह गिरकर 95.64 तक पहुंच गया। मंगलवार (2 जून 2026) को भी रुपया 17 पैसे कमजोर होकर 95.36 पर बंद हुआ था। लगातार दूसरे दिन गिरावट ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
अमेरिका की नई टैरिफ नीति से बढ़ा दबाव
विदेशी मुद्रा बाजार पर सबसे बड़ा असर अमेरिका के प्रस्तावित कदम का देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने 54 देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर 12.5% अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव दिया है। यह कदम कथित रूप से “फोर्स्ड लेबर” (बलपूर्वक श्रम) से जुड़े आयात उल्लंघनों के आधार पर प्रस्तावित किया गया है।
इस फैसले के बाद निवेशकों में अनिश्चितता बढ़ी है और वैश्विक व्यापार प्रवाह पर असर की आशंका जताई जा रही है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की नीतियां उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्रा पर दबाव डालती हैं।
भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि ऐसे मामलों को द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं के माध्यम से हल किया जाना चाहिए। सरकार का रुख है कि बिना ठोस आधार के लगाए गए आरोपों से वैश्विक व्यापार संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का असर
डॉलर इंडेक्स में मामूली मजबूती दर्ज की गई, जो 99.24 के आसपास ट्रेड कर रहा था। वैश्विक स्तर पर सुरक्षित निवेश (safe haven buying) की प्रवृत्ति के चलते डॉलर को सपोर्ट मिला है।
इसके साथ ही ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में 0.82% की बढ़त दर्ज की गई और यह 96.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए चिंता का कारण बनती है, क्योंकि इससे आयात बिल बढ़ता है और चालू खाते पर दबाव पड़ता है।
शेयर बाजार में भी कमजोरी
घरेलू इक्विटी बाजार में भी गिरावट का रुख देखा गया। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 699.74 अंक टूटकर 73,959.48 पर आ गया, जबकि निफ्टी 177.40 अंक गिरकर 23,302.50 के स्तर पर पहुंच गया।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारी बिकवाली भी बाजार पर दबाव का एक प्रमुख कारण रही। मंगलवार को FII ने शुद्ध रूप से 8,362.92 करोड़ रुपये की इक्विटी बेच दी, जिससे बाजार में नकारात्मक भावना और मजबूत हुई।
बाजार विशेषज्ञों की राय
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि रुपये पर दबाव कई कारकों का संयुक्त प्रभाव है—वैश्विक व्यापार तनाव, भू-राजनीतिक स्थिति और विदेशी निवेशकों की बिकवाली।
विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशक फिलहाल अमेरिका-ईरान संबंधों में तनाव और पश्चिम एशिया की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी नीति बैठक भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत दे सकती है।
भारत में आगामी 5 जून को होने वाली आरबीआई मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण होगी, जिसमें ब्याज दरों और महंगाई पर दिशा तय हो सकती है।
आगे की संभावनाएं
विश्लेषकों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बनी रहेगी, रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। हालांकि यदि कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है और विदेशी निवेश वापस लौटता है, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है।
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