CG News: छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के बोराई गाँव की 65 वर्षीय पुनिया बाई साहू का जीवन भले ही साधारण रहा हो, लेकिन उनका अंतिम सफ़र राज्य के सबसे संवेदनशील सामाजिक सवालों में बदल गया। दो साल पहले ईसाई धर्म अपनाने का उनका निर्णय उनकी मृत्यु के बाद ऐसा विवाद बना, जिसने उनके शव को तीन दिनों तक गाँव-गाँव भटकने पर मजबूर कर दिया।
बुधवार को पुनिया बाई का निधन हुआ। परिजन जब गाँव में अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे, तभी ग्रामीणों और हिंदू संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया। आपत्ति यह थी कि चूँकि महिला ने ईसाई धर्म अपना लिया था, इसलिए गाँव की ज़मीन पर उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जा सकता। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई।
स्थिति बिगड़ने पर परिजन शव लेकर तहसील मुख्यालय नगरी पहुँचे, लेकिन वहाँ भी विरोध का सामना करना पड़ा। जिस स्थान पर दफ़न की तैयारी की गई थी, उसे ग्रामीणों ने भर दिया। इस बीच महिला का शव तीन दिनों तक अंतिम संस्कार के इंतज़ार में पड़ा रहा।
आख़िरकार शुक्रवार को तब समाधान निकला, जब परिजनों ने प्रशासन, पुलिस अधिकारियों, सामाजिक प्रतिनिधियों और हिंदू संगठनों के सामने लिखित शपथ पत्र दिया। इसमें कहा गया कि वे भविष्य में ईसाई धर्म से कोई संबंध नहीं रखेंगे और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करेंगे। इसके बाद ही महिला का अंतिम संस्कार हिंदू परंपरा के अनुसार कराया गया।
धमतरी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मणिशंकर चंद्रा ने बताया कि यह मामला परिवार और समाज के बीच विवाद का था, जिसे सामाजिक बैठक के माध्यम से सुलझाया गया। प्रशासन के अनुसार किसी तरह की कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न न हो, इसलिए संयम के साथ समाधान निकाला गया।
यह घटना अकेली नहीं है। छत्तीसगढ़ में बीते कुछ वर्षों से ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों के अंतिम संस्कार को लेकर लगातार विवाद सामने आ रहे हैं, विशेषकर बस्तर अंचल में। कई मामलों में धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाया गया, हिंसक झड़पें हुईं और पुलिस तक को निशाना बनाया गया।
धमतरी की घटना के दिन ही कांकेर ज़िले के आमाबेड़ा क्षेत्र में अंतिम संस्कार विवाद के बाद हिंदू संगठनों ने छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान किया था, जिसे व्यापारिक संगठनों और कुछ सामाजिक समूहों का समर्थन भी मिला।
कांकेर के बड़े तेवड़ा पंचायत में सरपंच राजमन सलाम के पिता चमरा राम सलाम के अंतिम संस्कार को लेकर भी हाल ही में हिंसा हुई थी। परिवार ने ईसाई रीति से दफ़न किया, जिसका ग्रामीणों और संगठनों ने विरोध किया। झड़प में कई लोग घायल हुए और पुलिस को शव को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम के लिए भेजना पड़ा।
राजमन सलाम का कहना है कि यह विवाद धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक था। वहीं भाजपा नेताओं का आरोप है कि आदिवासी परंपराओं को दरकिनार कर ज़बरन धार्मिक प्रक्रियाएँ थोपी जा रही हैं।
इन घटनाओं ने अंतिम संस्कार के अधिकार को लेकर एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी व्यक्ति को उसके धर्म के आधार पर सम्मानजनक अंतिम संस्कार से वंचित किया जा सकता है?
इस साल जनवरी में ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था, जब बस्तर के ईसाई पादरी सुभाष बघेल के शव का अंतिम संस्कार तीन सप्ताह तक नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने विभाजित फ़ैसला दिया। एक न्यायाधीश ने इसे समानता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन माना, जबकि दूसरे ने सार्वजनिक व्यवस्था और स्थानीय नियमों को प्राथमिकता दी।
अंततः अदालत ने व्यावहारिक समाधान निकालते हुए पास के अधिसूचित ईसाई कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार कराने का निर्देश दिया, लेकिन कोई स्थायी दिशानिर्देश तय नहीं किया।
यही कारण है कि धमतरी हो या कांकेर, इस तरह के विवाद बार-बार सामने आ रहे हैं। प्रशासनिक असमंजस, सामाजिक दबाव और धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच, अंतिम संस्कार जैसा मानवीय विषय भी टकराव का कारण बनता जा रहा है।
पुनिया बाई साहू का मामला यह सवाल छोड़ जाता है कि क्या संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन-मृत्यु के अधिकार ज़मीनी स्तर पर वास्तव में सुरक्षित हैं, या फिर समाज की स्वीकार्यता ही अंतिम फ़ैसला तय कर रही है।
छत्तीसगढ़ में ईसाई धर्म अपनाने वाले नागरिकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार का मुद्दा अब भी एक संवेदनशील और अनसुलझी सामाजिक चुनौती बना हुआ है।
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