CG News: छत्तीसगढ़ के सुदूर जगरगुंडा इलाके से आई यह घटना ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत सामने रखती है। एम्बुलेंस की अनुपलब्धता के कारण एक 40 वर्षीय युवक की जान चली गई। दुखद यह रहा कि मौत के बाद भी शव ले जाने के लिए एम्बुलेंस नहीं मिली और परिजनों को खाट पर शव उठाकर गांव तक ले जाना पड़ा। यह मामला न केवल आपात सेवाओं की विफलता दिखाता है, बल्कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों पर भी सवाल खड़े करता है।
बीमारी और बिगड़ती हालत
जगरगुंडा क्षेत्र के चिमलिपेंटा गांव निवासी बारसे रामेश्वरम (40) पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके हाथ-पैर में सूजन और पेट दर्द की शिकायत थी। परिजनों के अनुसार, प्रारंभिक उपचार जगरगुंडा अस्पताल में कराया गया था, लेकिन घर लौटने के बाद अचानक उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गई।
स्थिति गंभीर होती देख परिजनों ने तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत महसूस की। इसी दौरान एम्बुलेंस बुलाने का प्रयास शुरू हुआ, जो आगे चलकर पूरे मामले का सबसे बड़ा संकट बन गया।
एम्बुलेंस के लिए घंटों इंतजार
परिजनों का कहना है कि एम्बुलेंस सेवा के लिए कई बार फोन किया गया। हर बार आश्वासन मिला, लेकिन घंटों बीतने के बाद भी कोई वाहन नहीं पहुंचा। ग्रामीण इलाके में वैकल्पिक साधनों की कमी के कारण समय के साथ मरीज की हालत और नाजुक होती चली गई।
आपात स्थिति में समय सबसे अहम होता है। लेकिन यहां समय के साथ सिर्फ इंतजार बढ़ता गया और मदद नहीं पहुंची।
दुपहिया से अस्पताल, रास्ते में मौत
किसी भी तरह इलाज तक पहुंचने की मजबूरी में परिजन युवक को दुपहिया वाहन से अस्पताल ले जाने के लिए निकले। यह निर्णय जोखिम भरा था, लेकिन विकल्प सीमित थे। दुर्भाग्य से अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में बारसे रामेश्वरम ने दम तोड़ दिया।
परिवार के लिए यह पल टूटने वाला था। इलाज की उम्मीद में निकले परिजन, रास्ते में मौत की खबर के साथ लौटे।
मौत के बाद भी नहीं मिली एम्बुलेंस
युवक की मौत के बाद परिजनों को लगा कि कम से कम शव को सम्मानपूर्वक घर ले जाने के लिए एम्बुलेंस उपलब्ध कराई जाएगी। लेकिन यहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी। बताया गया कि अवकाश होने के कारण एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकेगी।
इस जवाब ने परिजनों की पीड़ा और बढ़ा दी। आपात सेवाओं का अवकाश में ठप होना, ग्रामीणों के लिए सवाल बनकर खड़ा हो गया।
खाट पर शव, सिस्टम की कड़वी तस्वीर
अंततः कोई साधन न मिलने पर परिजन और गांव के लोग मजबूर हुए। शव को खाट पर रखकर घर तक ले जाया गया। यह दृश्य जिसने भी देखा, वह स्तब्ध रह गया। आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच खाट पर शव ले जाने की मजबूरी व्यवस्था की सबसे कड़वी तस्वीर बन गई।
यह घटना जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित जगरगुंडा अस्पताल क्षेत्र की है। मृतक का गांव चिमलिपेंटा, अस्पताल से करीब छह किलोमीटर दूर बताया गया है।
ग्रामीणों की नाराजगी और आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि जगरगुंडा और आसपास के इलाकों में एम्बुलेंस की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। कई बार मरीजों को निजी वाहनों या बाइक से अस्पताल ले जाना पड़ता है। रात और अवकाश के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी गंभीरता नहीं दिखाते। प्राथमिक उपचार के बाद रेफरल तो किया जाता है, लेकिन मरीज को आगे ले जाने की ठोस व्यवस्था अक्सर नदारद रहती है।
सरकारी खर्च और जमीनी हकीकत
केंद्र और राज्य सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं पर बड़े बजट और योजनाओं का दावा करती हैं। एम्बुलेंस नेटवर्क, ग्रामीण अस्पताल और आपात चिकित्सा सेवाओं के विस्तार की बातें होती हैं। लेकिन जगरगुंडा की यह घटना बताती है कि योजनाओं और क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर एम्बुलेंस और इलाज मिल जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। यहां देरी सीधे तौर पर जानलेवा साबित हुई।
प्रभाव और आगे की जरूरत
इस घटना ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने गंभीर सवाल रख दिए हैं। जरूरत है कि:
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जगरगुंडा जैसे दूरस्थ इलाकों में 24×7 एम्बुलेंस सेवा सुनिश्चित की जाए
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अवकाश के नाम पर आपात सेवाएं बाधित न हों
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जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए
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ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक आपात परिवहन की व्यवस्था मजबूत की जाए
यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएं दोहराने से नहीं रुकेंगी। एक तरफ आधुनिक भारत के दावे, दूसरी तरफ खाट पर शव—यह विरोधाभास व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।
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