CG News: छत्तीसगढ़ में जबरन और प्रलोभन आधारित धर्मांतरण के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य सरकार अब निर्णायक कदम उठाने जा रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार आगामी विधानसभा के शीतकालीन सत्र (14 से 17 दिसंबर 2025) में कठोर “मतांतरण विरोधी विधेयक” पेश करेगी। विधेयक के तहत जबरन, धोखे, भय या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने वालों को 10 वर्ष तक की सजा और कड़े दंड का प्रावधान होगा।
यह प्रस्तावित कानून छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968 को पूरी तरह बदल देगा, जिसमें अभी तक सिर्फ 1 वर्ष की सजा और 5 हजार रुपये जुर्माने का नियम प्रभावी था। सरकार का तर्क है कि पुराने कानून की कमजोरियों के कारण अवैध मतांतरण को रोकना कठिन हो रहा था।
कानून की जरूरत क्यों पड़ी

पिछले कुछ वर्षों में बस्तर, जशपुर, रायगढ़, कोरबा, सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों में धर्मांतरण से जुड़े विवाद और तनाव बढ़े हैं। कई स्थानों पर सामाजिक संघर्ष और हिंसा भी सामने आई है। प्रशासनिक रिपोर्टों में कहा गया है कि विभिन्न संस्थाएं चंगाई सभाओं, दवाइयों, शिक्षा, वित्तीय मदद, इलाज, रोजगार और नकद लाभ के लालच के जरिए आदिवासियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभित कर रही थीं।
बीते दो वर्षों का सरकारी डेटा
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105 शिकायतें दर्ज हुईं
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पिछले एक साल में 25 मामलों में आपराधिक मुकदमा दर्ज
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अब तक 50 प्राथमिकियाँ (FIR) दर्ज
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कई मामलों में समुदायों के बीच टकराव हुआ
इन घटनाओं ने सरकार को सख्त कानून लाने की दिशा में बढ़ने के लिए मजबूर किया। मुख्यमंत्री ने हाल में कलेक्टर-एसपी सम्मेलन में कहा था कि:
“चंगाई सभाओं में प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने वालों पर कड़ी निगरानी रखी जाए। धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसी कीमत पर स्वीकार नहीं।”
नए कानून के मुख्य प्रावधान
सरकार ने ओडिशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, हिमाचल, गुजरात, तेलंगाना, तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश सहित 9 राज्यों के धर्म स्वतंत्रता अधिनियमों का अध्ययन किया। मसौदा 5 पेज का है और इसमें 17 महत्वपूर्ण बिंदु शामिल हैं:
कड़े दंड
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जबरन, धोखे या प्रलोभन वाले धर्मांतरण पर अधिकतम 10 वर्ष की सजा

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बिना अनुमति कराया गया धर्मांतरण गैरकानूनी
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बिना सूचना मतांतरण करने पर सख्त दंड
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आर्थिक लालच, नौकरी का लालच, शादी, इलाज, शिक्षा, सेवा को प्रलोभन की श्रेणी में माना जाएगा
प्रशासन को अनिवार्य सूचना
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धर्म परिवर्तन की जानकारी 60 दिन पहले जिला प्रशासन को देना अनिवार्य
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अनुमति के बिना कराया गया परिवर्तन रद्द माना जाएगा
धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा
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किसी भी नागरिक को अपनी इच्छा से धर्म बदलने का अधिकार कानून सुरक्षित करेगा
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लेकिन अनैतिक, दबाव आधारित या संगठित धर्मांतरण को अपराध माना जाएगा
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस कानून के संकेत मिलते ही राजनीतिक बयानबाजी तेज़ हो गई है।
विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सरकार धार्मिक ध्रुवीकरण कर रही है, जबकि सत्तापक्ष का दावा है कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए है।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि:
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आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और परंपराएं खतरे में हैं

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जबरन धर्मांतरण सांप्रदायिक तनाव को जन्म दे रहा
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बस्तर में संघर्ष की कई घटनाएं कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बन चुकी हैं
आदिवासी समुदाय क्यों चिंतित
आदिवासी समाज के कई संगठनों ने कहा है कि प्रलोभन आधारित धर्मांतरण से उनकी
धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक धरोहर और सामुदायिक एकता प्रभावित हो रही है। बस्तर, नारायणपुर और जशपुर में कई स्थानों पर झड़पें और विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं।
कई सर्वेक्षणों में सामने आया कि स्कूल, अस्पताल और आर्थिक सहायता के नाम पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जा रहा था।
जनभावना और कानून-व्यवस्था
इस विषय पर प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है:
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“हाल ही में कई क्षेत्रों में सामाजिक तनाव बढ़ा है”
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“कानून-व्यवस्था को बचाने के लिए कड़ी निगरानी जरूरी है”
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“नया कानून दुष्प्रचार, उग्र प्रदर्शन और झूठे प्रलोभन पर रोक लगाएगा”
लाभ और संभावित असर
सरकार का दावा है कि यह कानून:
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अवैध मतांतरण रोकने में सहायक होगा
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आदिवासी समाज में शांति और सामंजस्य बनाएगा
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न्यायिक कार्रवाई को सशक्त करेगा
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धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा करेगा
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सामाजिक टकराव और विभाजन को कम करेगा
कानून लागू होने के बाद सभी धार्मिक संस्थाओं, NGOs और चर्चों को कानूनी पारदर्शिता और दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ सरकार का प्रस्तावित “सख्त मतांतरण विरोधी कानून” धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक संरक्षण की बहस को और तेज कर देगा। इसके लागू होने के बाद राज्य में धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों पर कानूनी निगरानी मजबूत होगी।
राज्य सरकार इसे न्याय, सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव का कानून बताती है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक उद्देश्य मानता है। अब सबकी निगाहें शीतकालीन सत्र और विधेयक पेश होने के बाद की स्थितियों पर टिकी हैं।
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