CG Independence Day: छत्तीसगढ़ के बस्तर में कभी नक्सलियों के सबसे सुरक्षित ठिकानों में गिने जाने वाले कर्रेगुट्टा की तस्वीर अब बदलती नजर आ रही है। छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सीमाओं से लगे इस दुर्गम पहाड़ी इलाके में तिरंगा फहराया गया। स्वतंत्रता दिवस से पहले निकली तिरंगा यात्रा करीब 7.2 किलोमीटर ऊपर पहाड़ी तक पहुंची, जहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बीच राष्ट्रध्वज लहराया गया। यह वही इलाका बताया गया है, जिसे लंबे समय तक नक्सलियों के रणनीतिक अड्डे के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा।
कभी नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना
कर्रेगुट्टा की पहाड़ियां घने जंगल, दुर्गम रास्तों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बनी रहीं। तीन राज्यों की सीमा से जुड़े इस इलाके को नक्सली संगठन ने अपने सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया।
पहाड़ी और जंगलों के बीच नक्सलियों के ठिकाने, हथियारों से जुड़े स्थान और IED छिपाने के लिए बनाए गए स्थान होने की जानकारी सुरक्षा अभियानों के दौरान सामने आई। इसी कारण आम लोगों की यहां पहुंच लंबे समय तक बेहद मुश्किल रही।
अब पहाड़ी पर लहरा रहा तिरंगा
तस्वीर अब बदल गई है। ताड़पाला से कर्रेगुट्टा हिल्स की ओर करीब 7.2 किलोमीटर सड़क का निर्माण चल रहा है। सड़क का एक हिस्सा तैयार होने के बाद अब फोर-व्हीलर से भी पहाड़ी के ऊपरी हिस्से तक पहुंच संभव हो रही है।
तिरंगा यात्रा के अंतिम दिन सरकार और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में पहाड़ी पर राष्ट्रध्वज फहराया गया। इस दौरान आसपास के ग्रामीण भी यात्रा में शामिल हुए और करीब 7 किलोमीटर तक पैदल चलकर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे।
झीरम और बड़े हमलों की प्लानिंग का दावा
कर्रेगुट्टा को नक्सली गतिविधियों के रणनीतिक केंद्र के तौर पर देखा जाता रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बस्तर में होने वाली बड़ी नक्सली वारदातों की रणनीति इसी तरह के सुरक्षित जंगल क्षेत्रों में तैयार की जाती थी।
रिपोर्ट में झीरम घाटी हमले और दंतेवाड़ा के तत्कालीन विधायक भीमा मंडावी की हत्या की प्लानिंग से भी इस इलाके को जोड़ा गया है। हालांकि, इन विशिष्ट घटनाओं की योजना इसी स्थान पर बनने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि इस सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
हथियार और IED का रहा नेटवर्क
सुरक्षा बलों के अभियानों के दौरान कर्रेगुट्टा क्षेत्र में नक्सलियों से जुड़े हथियार और विस्फोटक सामग्री मिलने की जानकारी सामने आती रही है। घने जंगल और पहाड़ी इलाके नक्सलियों को अपनी गतिविधियों को छिपाने में मदद करते थे।
इलाके में IED के खतरे के कारण सुरक्षा बलों को आगे बढ़ते समय विशेष सावधानी बरतनी पड़ती थी। सड़क निर्माण और सुरक्षा कैंपों की स्थापना के साथ अब इस क्षेत्र में राज्य की पहुंच लगातार बढ़ रही है।
2025 का ऑपरेशन बना बड़ा मोड़
अप्रैल 2025 में कर्रेगुट्टा क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने बड़ा अभियान चलाया था। करीब 21 दिनों तक चले इस ऑपरेशन को नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई के तौर पर देखा गया। अभियान के दौरान बड़ी संख्या में हथियार और अन्य सामग्री बरामद होने की जानकारी सामने आई।
इस कार्रवाई के बाद इलाके में सुरक्षा बलों की मौजूदगी और मजबूत हुई। इसके साथ ही उस क्षेत्र में सड़क, कैंप और अन्य बुनियादी ढांचे के विस्तार का रास्ता भी खुला।
जहां नक्सली रोकते थे तिरंगा
गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि ग्रामीणों ने उन्हें बताया कि पहले नक्सली उन्हें तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं देते थे। उनके मुताबिक, तिरंगा फहराए जाने के बाद उसके ऊपर नक्सली झंडा लगाए जाने की घटनाएं भी होती थीं।
अब उसी इलाके में तिरंगा फहराया जाना बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है। शर्मा ने कहा कि यह बदलाव सुरक्षा बलों के संघर्ष और बलिदान से संभव हुआ है।
जवानों के बलिदान को किया याद
विजय शर्मा ने नक्सल विरोधी अभियानों में शहीद हुए जवानों को याद करते हुए कहा कि कर्रेगुट्टा तक राज्य की पहुंच जवानों के साहस और बलिदान का परिणाम है। उन्होंने ताड़मेटला की घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें 76 जवानों के शहीद होने की बात कही।
उनका कहना था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आए जवानों ने बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी और आज कर्रेगुट्टा में तिरंगे का लहराना उनके संघर्ष का परिणाम है।
शहीदों की मिट्टी से बनेगा स्मारक
वन मंत्री केदार कश्यप ने बताया कि नारायणपुर से शुरू हुई तिरंगा यात्रा करीब 500 से 600 किलोमीटर का सफर तय करते हुए 14 अगस्त को कर्रेगुट्टा पहुंची।
उन्होंने कहा कि जिन स्थानों पर सुरक्षा बलों के जवान शहीद हुए, वहां की मिट्टी एकत्र की गई है। इस मिट्टी से शहीदों की स्मृति में स्मारक बनाने का संकल्प लिया गया है।
ग्रामीणों की भागीदारी बनी खास तस्वीर
इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी रही। जिन इलाकों में लंबे समय तक नक्सली हिंसा के कारण आम लोगों की आवाजाही सीमित रही, वहीं ग्रामीण तिरंगा लेकर पहाड़ी की ओर बढ़ते दिखाई दिए।
युवा, ग्रामीण और सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने इस आयोजन को केवल स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा। यह बस्तर के उस हिस्से में बदलती परिस्थितियों और राज्य की बढ़ती पहुंच का प्रतीक बनकर सामने आया।
ब्लैक फॉरेस्ट से विकास की ओर
कर्रेगुट्टा को लंबे समय तक नक्सलियों के प्रभाव वाले घने जंगलों के कारण ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ के नाम से जोड़ा जाता रहा। अब उसी इलाके में सुरक्षा कैंप, सड़क निर्माण और तिरंगा यात्रा की तस्वीर सामने आई है। छत्तीसगढ़ की हर अपडेट के लिए हमारे WhatsApp चैनल को फॉलो करें- https://whatsapp.com/channel/0029VbBj50DATRSgaSxCmo2v




