Thursday, February 5, 2026
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Bastar Olympics: एक पैर गंवाया, पर सपने नहीं टूटे, बस्तर ओलंपिक में किशन कुमार हपका ने जीता गोल्ड

Bastar Olympics: छत्तीसगढ़ के बस्तर से निकली यह कहानी सिर्फ एक गोल्ड मेडल की नहीं है, बल्कि उस हिम्मत की है जो हालात से हार मानने से इनकार कर देती है। बीजापुर जिले के भैरमगढ़ विकासखंड के छोटे से गांव छोटे तुमनार के 27 वर्षीय किशन कुमार हपका ने यह साबित कर दिया कि सच्चा खिलाड़ी मैदान में उतरने से पहले मन में जीत दर्ज करता है। एक पैर खोने के बाद भी उन्होंने खुद को कमजोर नहीं माना और बस्तर ओलंपिक 2024 में तीरंदाजी प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया

किशन कुमार हपका कभी डीआरजी के जांबाज जवान थे। 18 जुलाई 2024 को नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी विस्फोट की चपेट में आने से उनका एक पैर चला गया। यह हादसा किसी भी इंसान को अंदर से तोड़ सकता था। महीनों तक इलाज, दर्द, मानसिक संघर्ष और भविष्य को लेकर अनिश्चितता—सब कुछ किशन के सामने था। लेकिन जहां हालात किसी को पीछे खींच लेते हैं, वहीं किशन ने इन्हें अपनी ताकत बना लिया।

इलाज के दौरान कई बार ऐसा वक्त आया जब लगा कि अब जिंदगी पहले जैसी नहीं रहेगी। एक फौजी के लिए शरीर का मजबूत होना सिर्फ जरूरत नहीं, पहचान भी होती है। जब वही पहचान टूटती दिखी, तो हौसला भी डगमगाया। लेकिन खेल के प्रति उनका लगाव और देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना आज भी उतनी ही जिंदा थी। यही सोच उन्हें फिर से खड़ा करने लगी।

किशन ने तय किया कि अगर वर्दी में देश की सेवा नहीं कर पाए, तो खेल के मैदान में अपनी पहचान बनाएंगे। उन्होंने तीरंदाजी को चुना—एक ऐसा खेल, जिसमें शारीरिक संतुलन के साथ मानसिक मजबूती सबसे जरूरी होती है। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उनके इरादे साफ थे। शरीर ने साथ छोड़ा था, पर मन आज भी मजबूत था।

कड़ी मेहनत और अनुशासन के साथ किशन ने अभ्यास शुरू किया। शुरुआत में हर दिन एक चुनौती थी। संतुलन बनाना, लंबे समय तक खड़े रहना, निशाने पर फोकस करना—हर कदम पर संघर्ष था। लेकिन हर तीर के साथ उनका आत्मविश्वास भी मजबूत होता गया। जल्द ही उन्होंने खुद को साबित कर दिया और बस्तर ओलंपिक के जिला स्तरीय मुकाबलों के लिए चयनित हो गए।

जिला स्तर पर शानदार प्रदर्शन के बाद किशन संभाग स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंचे। यहां मुकाबला कड़ा था, लेकिन किशन की आंखों में सिर्फ जीत का लक्ष्य था। हर निशाने के साथ उनकी कहानी और मजबूत होती गई। अंततः उन्होंने पहला स्थान हासिल कर गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। यह जीत सिर्फ एक प्रतियोगिता की नहीं थी, बल्कि उस जंग की थी जो उन्होंने अपने हालात से लड़ी थी।

किशन अपनी इस सफलता का श्रेय अपने कोच दुर्गेश प्रताप सिंह को देते हैं। उनके मुताबिक, कोच ने उन्हें सिर्फ खेल नहीं सिखाया, बल्कि यह विश्वास भी दिया कि अपंगता शरीर की होती है, हौसले की नहीं। कोच दुर्गेश ने हर उस पल में किशन का साथ दिया, जब आत्मविश्वास डगमगाने लगता था। यही मार्गदर्शन उनकी सफलता की बड़ी वजह बना।

आज भैरमगढ़ ब्लॉक के छोटे से गांव छोटे तुमनार से निकले किशन कुमार हपका पूरे बस्तर के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि संसाधनों की कमी, शारीरिक चुनौती या परिस्थितियों की मार—कुछ भी इंसान को रोक नहीं सकता, अगर इरादे मजबूत हों। किशन की यह उपलब्धि न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि पूरे बीजापुर जिले के लिए गर्व का विषय है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि किशन की जीत ने गांव के बच्चों और युवाओं में नई उम्मीद जगाई है। जहां कभी खेल सिर्फ शौक माना जाता था, अब उसे भविष्य के रूप में देखा जाने लगा है। किशन खुद भी चाहते हैं कि उनकी कहानी उन युवाओं तक पहुंचे, जो किसी न किसी वजह से खुद को कमजोर मान बैठे हैं।

किशन का कहना है कि यह तो बस शुरुआत है। आने वाले समय में वे राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना चाहते हैं और बस्तर का नाम रोशन करना चाहते हैं। उनका सपना है कि दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं मिलें, ताकि कोई भी प्रतिभा हालात की वजह से पीछे न रह जाए।

बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन इस बात का प्रमाण हैं कि अगर सही मंच मिले, तो बस्तर की प्रतिभाएं किसी से कम नहीं। किशन कुमार हपका की यह उड़ान बताती है कि सपनों के लिए पंख नहीं, हौसले चाहिए। एक पैर खोने के बाद भी उन्होंने जो हासिल किया, वह हजारों लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी है।

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