Republic Day 2026: गणतंत्र का नया सूर्योदय: डर से भरोसे की ओर सफर
77वें गणतंत्र दिवस ने बस्तर में इतिहास रचा। जिन गांवों में 26 जनवरी का मतलब सन्नाटा, भय और बंद दरवाजे हुआ करता था, वहां 2026 के गणतंत्र दिवस पर सुबह सूरज के साथ तिरंगा भी उगा। चार दशक की हिंसक परछाइयों को पीछे छोड़ते हुए 40 गांवों ने संविधान को खुलकर सलामी दी और पहली बार राष्ट्रगान की धुन गूंजी।
स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ ध्वजारोहण नहीं, बल्कि भय से नागरिकता की ओर संक्रमण था—जहां वर्षों तक ‘तिरंगा’ का उल्लेख भी खतरे से जुड़ा था, वहां आज बच्चों ने तिरंगा हाथ में पकड़कर राष्ट्रगान गाया।
करेक्ट गुट्टा से अबूझमाड़ तक बदलता जनमानस
बस्तर के दक्षिणी इलाकों में कर्रेगुट्टा, एड़जुम, पेद्दाकोरमा जैसे गांव इस बदलाव के प्रतीक बने। कर्रेगुट्टा, जो कभी माओवादी गतिविधियों का गढ़ और तेलंगाना सीमा का बेस ज़ोन माना जाता था, अब सुरक्षा कैंप के साथ सामरिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर ‘रिक्लेम्ड’ स्पेस बन चुका है।
एड़जुम गांव के रामधेर माड़वी बताते हैं—
“पहले 26 जनवरी का मतलब खतरा था, आज मतलब गर्व। पहली बार बच्चों को बताया कि यह हमारा झंडा है और हमारा संविधान है।”
बीजापुर के पेद्दाकोरमा गांव में किसान सोमड़ू पोड़ियम ने कहा—
“जिंदगी में पहली बार अपने गांव में तिरंगा देखा। आज लग रहा है कि हम भी इस देश के पूरे नागरिक हैं।”
डबल इंजन सरकार की रणनीति और निर्णायक मोड़
वर्ष 2021–2025 के बीच माओवादी कोर एरियाज़ में सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी रणनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। बीते एक साल में 58 नए कैंप खोले गए और इनमें से 53 कैंपों में 2026 में पहली बार गणतंत्र दिवस का ध्वजारोहण हुआ।
चार वर्ष में कुल 135 कैंप स्थापित हुए, जिनका असर दो स्तरों पर देखा गया—
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भौगोलिक और सामरिक नियंत्रण में बढ़ोतरी
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दैनिक जीवन में राज्य की ठोस उपस्थिति
यही वजह है कि आज बस्तर का लगभग 95% हिस्सा माओवादी हिंसा से मुक्त बताया जा रहा है, जो एक दशक पहले अकल्पनीय स्थिति थी।
संघर्ष, बलिदान और दर्द की पृष्ठभूमि
बस्तर का यह परिवर्तन किसी एक अभियान का परिणाम नहीं, बल्कि दो दशकों में फैले संघर्ष, बलिदानों और नीतिगत बदलाव का संचयी असर है।
2001 से दिसंबर 2025 के बीच हुई मुठभेड़ों, हमलों और अभियानों में सुरक्षा बलों, स्थानीय नागरिकों और माओवादी संरचनाओं—तीनों स्तरों पर भारी नुकसान हुए। झीरम, ताड़मेटला, टेकुलगुड़ेम जैसे हमलों ने इस संघर्ष की पीड़ा को राष्ट्रीय स्मृति में दर्ज किया। निर्णायक मोड़ वर्ष 2025 में आया, जब स्थायी नियंत्रण को तरजीह दी गई और ग्रामीण संपर्क को प्राथमिकता मिली।
“डर से आज़ादी” का अर्थ: नागरिकता की पुनर्स्थापना
जो गांव दशकों तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कटे रहे, वहां 2026 में पहली बार ध्वजारोहण हुआ—यह घटना सिर्फ सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि सिविक राइट्स की बहाली और राष्ट्रीय नागरिकता की अनुभूति है।
सामाजिक स्तर पर सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि ग्रामीण अब राज्य के साथ संवाद में लौट रहे हैं—स्कूलों में उपस्थिति बढ़ी, सड़कों पर आवागमन खुला, और आजादी के प्रतीकों को सामूहिक रूप से अपनाया जाने लगा।
राष्ट्रीय प्रभाव व आगे की चुनौती
बस्तर मॉडल की यह उपलब्धि संघर्ष क्षेत्रों में शासन की ‘प्रेज़ेन्स vs पावर’ की बहस को नया संदर्भ देती है।
अगली चुनौतियां होंगी—
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पुनर्वास और आजीविका
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शिक्षा–स्वास्थ्य पहुंच
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सामाजिक विश्वास की दीर्घकालिक बहाली

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अंतर-ग्रामीण कनेक्टिविटी
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संघर्ष की शेष जेबों का शांतिपूर्ण एकीकरण
2026 का गणतंत्र दिवस इस बदलाव को राष्ट्रीय मंच पर दर्ज करता है—कि बस्तर सिर्फ सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि पुनर्सृजन की कहानी है।
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