CG Dhan Kharidi: रायगढ़ जिले के पाली विकासखंड के ग्राम नोनबिर्रा में धान खरीदी व्यवस्था को लेकर किसानों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। उपार्जन केंद्र में भरपूर आवक के बावजूद किसानों को अपना धान बेचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। धान तैयार होने और बोरियों में भरकर मंडी पहुंच जाने के बाद भी खरीदी नहीं होने से किसान असहाय और परेशान दिखाई दे रहे हैं।
किसानों की शिकायत: धान तैयार, लेकिन मंडी में रुकी खरीदी
ग्रामीण किसानों ने बताया कि मंडी परिसर में धान लंबे समय से जमा है, लेकिन खरीदी में देरी हो रही है। किसानों के अनुसार धान की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप है, फिर भी नियमों और औपचारिकताओं का हवाला देकर उन्हें लौटाया जा रहा है।
मंडी संचालकों और संबंधित अधिकारियों द्वारा जारी निर्देशों के चलते खरीदी प्रक्रिया धीमी हो गई है। किसानों का कहना है कि जब सीजन में धान तैयार हो चुका है और मंडी में पहुंच भी गया है, तो प्रक्रिया में बाधा डालना ‘ओपेन मार्केट टाइमिंग’ और ‘भुगतान चक्र’ दोनों पर असर डाल रहा है।
ऑनलाइन टोकन भी नहीं बना गारंटी — ‘कोटा’ और ‘निर्देश’ के नाम पर कटौती
पाल़ी क्षेत्र के किसान मंगल सिंह कंवर ने बताया कि उन्होंने ऑनलाइन टोकन के माध्यम से 32 क्विंटल धान बेचने के लिए पंजीकरण कराया। लेकिन मंडी में केवल 23 क्विंटल धान ही लिया गया, जबकि 9 क्विंटल वापस लौटा दिया गया।
किसान के अनुसार, मंडी कर्मियों ने कहा कि अधिकारियों के निर्देश पर सीमित मात्रा में ही खरीदी की जा रही है। इससे स्पष्ट होता है कि टोकन सिस्टम होने के बाद भी खरीदी व्यवस्था व्यवहारिक स्तर पर अटक रही है।
ऑनलाइन टोकन व्यवस्था किसानों की सुविधा बढ़ाने के लिए लागू की गई थी, पर ज़मीनी स्तर पर ‘क्विंटल स्वीकृति’ को लेकर कटौती ने इस प्रणाली को अधूरा बना दिया है।
किसानों की आर्थिक चिंता: अगली फसल पर पड़ रहा असर
ग्रामीण किसानों ने कहा कि धान बेचने में बाधा आने से उनके भुगतान चक्र पर गंभीर असर पड़ रहा है। खरीफ के बाद रबी सीजन में गेहूं, चना और सब्जी उत्पादन की तैयारी चलती है, जिसके लिए बीज, खाद और सिंचाई की लागत समय पर चुकानी पड़ती है।
यदि भुगतान में देरी होती है या खरीदी सीमित होती है, तो किसान या तो उधारी में फंसता है या अगली फसल की तैयारी प्रभावित हो जाती है। कई किसानों के अनुसार धान वापस लौटाने का अर्थ सीधे-सीधे अधिक भंडारण, परिवहन और श्रम लागत बढ़ना है।
किसानों का मानना है कि सरकार की नीतियों का असल लाभ तभी मिलेगा जब खरीदी केंद्रों में प्रक्रिया सहज और समयबद्ध हो।
प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग, मंडी स्तर पर निर्देशों पर सवाल
किसानों ने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि राज्य स्तर पर धान खरीदी के लिए जिस मंशा से नीति बनाई गई, उसके विपरीत जमीनी स्तर पर ‘निर्देशों’ और ‘नियमों’ की आड़ में दिक्कतें पैदा की जा रही हैं।
मंडी संचालकों पर आरोप है कि नियमों का हवाला देकर सीमित खरीदी की जा रही है, जबकि सरकारी घोषणाओं में स्पष्ट कहा जाता है कि किसानों को धान बेचने में कठिनाई नहीं होगी। इस विरोधाभास से किसानों में असंतोष बढ़ रहा है।
किसानों की चेतावनी: सुधार न हुआ तो होगा विरोध
कई किसानों ने कहा कि यदि धान खरीदी व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो वे सामूहिक विरोध प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे। उनका तर्क है कि धान खरीदी केवल आर्थिक नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन के संपूर्ण उत्पादन चक्र से जुड़ा मुद्दा है।
विरोध की संभावना बढ़ने के पीछे कारण यह भी है कि इस क्षेत्र में खरीदी व्यवस्था पहले भी सुस्त और विवादित रही है, जिसके चलते किसानों में पहले से असंतोष मौजूद है।
कृषि अर्थव्यवस्था पर असर और राज्य स्तरीय नजर
छत्तीसगढ़ ₹ MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और धान खरीदी व्यवस्था के लिए पूरे देश में चर्चा में रहता है। यहां धान खरीदी का पैमाना राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को बड़ी मात्रा में प्रभावित करता है। इसलिए खरीदी में अड़चनों का असर केवल स्थानीय किसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि बाजार, भुगतान और स्टोरेज बैलेंस पर भी दिखाई देता है।
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